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बारिश के मौसम ने कुम्हारों की आजीविका पर लगाया ब्रेक, नारायणपुर में करीब 10 दिनों से मिट्टी के बर्तन बनाने का काम बंद, मौसम की मार से किसानों के साथ साथ कुम्हारों की चिंता बढ़ाई,

बारिश के मौसम ने कुम्हारों की आजीविका पर लगाया ब्रेक,

नारायणपुर में करीब 10 दिनों से मिट्टी के बर्तन बनाने का काम बंद, मौसम की मार से किसानों के साथ साथ कुम्हारों की चिंता बढ़ाई,

लगातार बारिश और मौसम में बदलाव का असर अब किसानों के साथ-साथ पारंपरिक कुम्हारों की आजीविका पर भी देखने को मिल रहा है। नारायणपुर जिले में बारिश के कारण मिट्टी के बर्तन और पारंपरिक दीये बनाने का काम प्रभावित हुआ है। जिले के कुम्हार पिछले करीब 10 दिनों से मिट्टी का काम बंद रखने को मजबूर हैं। ऐसे में आगामी दीपावली पर्व को लेकर उनकी चिंता बढ़ गई है। यदि मौसम का यही हाल रहा तो बाजार में मिट्टी के दीयों की उपलब्धता और कीमतों पर भी इसका असर पड़ सकता है। ने बताया कि उनका परिवार पीढ़ियों से मिट्टी के बर्तन और पारंपरिक दीये बनाने का काम करता आ रहा है। पूर्वजों से मिली इस कला को आज भी परिवार के लोग आगे बढ़ा रहे हैं। वे मिट्टी से बर्तन और दीये तैयार कर आसपास के साप्ताहिक बाजारों में ले जाकर बेचते हैं। इसी पारंपरिक व्यवसाय से उनके परिवार की आजीविका चलती है। लेकिन बीते दिनों हुई बारिश ने उनके कामकाज को पूरी तरह प्रभावित कर दिया है।कुम्हारों के लिए दीपावली साल का सबसे महत्वपूर्ण समय माना जाता है। इस दौरान मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ जाती है और कुम्हार महीनों पहले से इसकी तैयारी शुरू कर देते हैं। लेकिन इस बार लगातार बारिश के चलते दीये बनाने, उन्हें सुखाने और बाजार तक पहुंचाने की प्रक्रिया प्रभावित हुई है, कुम्हारों का कहना है कि बारिश के कारण मिट्टी का काम करीब 10 दिनों से बंद पड़ा है। मिट्टी से तैयार दीयों और बर्तनों को सुखाने के लिए पर्याप्त धूप की जरूरत होती है। लगातार बादल छाए रहने और बारिश होने से तैयार सामग्री को सुखाना मुश्किल हो जाता है। सोमवार को भी दिनभर बादल छाए रहने से मिट्टी के काम पर असर पड़ा।मिट्टी के दीये तैयार करने में मिट्टी जुटाने से लेकर उसे गूंथने, आकार देने, सुखाने और अंतिम रूप देने तक कई चरणों से गुजरना पड़ता है। बारिश के कारण इन सभी प्रक्रियाओं में बाधा आ रही है। इससे कुम्हारों को समय पर दीये तैयार करने में परेशानी हो रही है। मिट्टी के बर्तन और दीये तैयार करने में लगने वाली शारीरिक मेहनत बहुत लगती है व कुम्हारों का मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने का व्यवसाय केवल आजीविका का साधन ही नहीं, बल्कि वर्षों पुरानी पारंपरिक कला और संस्कृति का हिस्सा भी है। दीपावली जैसे पर्व पर मिट्टी के दीयों की विशेष मांग रहती है। ऐसे में मौसम की मार से प्रभावित कुम्हारों को राहत और आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराने की जरूरत है, ताकि उनकी आजीविका सुरक्षित रह सके और पारंपरिक कला आने वाली पीढ़ियों तक कायम रहे।