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विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा हेतु मां दंतेश्वरी की डोली और छत्र दंतेवाड़ा से रवाना। बस्तर दशहरा क्यों है खास पढ़िए रिपोर्ट…..

 

जगदलपुर/दंतेवाड़ा। बस्तर की आस्था और परंपरा का सबसे बड़ा पर्व विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा एक बार फिर भव्य स्वरूप लेने को तैयार है। रविवार को दंतेवाड़ा से मां दंतेश्वरी की डोली और छत्र पारंपरिक विधि-विधान एवं राजपरंपरा का निर्वहन करते हुए जगदलपुर के लिए रवाना हुई। मंदिर प्रांगण श्रद्धालुओं से खचाखच भरा रहा और हर ओर “जय मां दंतेश्वरी” के जयकारे गूंज उठे।

परंपरा और विधि-विधान

डोली यात्रा की रवानगी से पूर्व मां दंतेश्वरी की विशेष पूजा-अर्चना की गई। दंतेवाड़ा पुलिस ने माता को सलामी दी और राजपरंपरा के अनुसार नगर राजा बोधराज देव को नगर की जिम्मेदारी सौंपने के बाद ही डोली यात्रा का शुभारंभ हुआ। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।

75 दिवसीय ऐतिहासिक यात्रा

डोली और छत्र की यह ऐतिहासिक यात्रा पूरे 75 दिनों तक चलेगी। यात्रा पारंपरिक मार्गों से होकर कारली, गीदम, बास्तानार, किलेपाल, कोड़ेनार और तोकापाल से गुजरते हुए जगदलपुर पहुंचेगी। हर पड़ाव पर श्रद्धालु माता की आराधना करेंगे और विधिवत पूजा-अर्चना कर भव्य स्वागत करेंगे।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व

बस्तर दशहरा में रावण का दहन का नहीं बल्कि यह बस्तर की आस्था, संस्कृति और जनजातीय परंपराओं का जीवंत उत्सव है। इसकी जड़ें लगभग 600 वर्ष पूर्व काकतीय वंश से जुड़ी मानी जाती हैं।

इतिहासकारों के अनुसार वारंगल (तेलंगाना) के काकतीय वंश के शासक अन्नम देव ने 14वीं शताब्दी में बस्तर में अपना शासन स्थापित किया। वे मां दंतेश्वरी को कुल देवी मानते थे। कहा जाता है कि राजवंश को मां का आशीर्वाद प्राप्त था और तभी से बस्तर दशहरा का प्रारंभ मां की डोली की रवानगी से होता है।

एक लोककथा के अनुसार, राजा अन्नम देव ने मां दंतेश्वरी की मूर्ति दंतेवाड़ा में स्थापित की और नगर की रक्षा का दायित्व नगर राजा को सौंपकर हर साल दशहरे में मां की डोली जगदलपुर भेजी जाने की परंपरा शुरू हुई। तभी से यह यात्रा आस्था और विश्वास का केंद्र बनी हुई है।

बस्तर की पहचान

75 दिनों तक चलने वाला यह पर्व विश्व का सबसे लंबा उत्सव माना जाता है। इसमें केवल धार्मिक स्वरूप ही नहीं बल्कि बस्तर की जनजातीय संस्कृति, परंपरागत रस्में, लोकनृत्य, लोकगीत और हजारों श्रद्धालुओं की भागीदारी शामिल होती है। यही वजह है कि बस्तर दशहरा को न केवल आस्था का पर्व बल्कि बस्तर की सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक भी माना जाता है।