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नक्सलियों की MMC ज़ोन के प्रवक्ता अनंत का सरेंडर, 10 अन्य साथियों ने भी महाराष्ट्र में डाले हथियार।

प्रेस नोट जारी कर मांगा था समय, लेकिन उससे पहले ही डाल दिए हथियार।

जगदलपुर। नक्सली आंदोलन के लिए नया मोड़ देने वाली एक बड़ी घटना महाराष्ट्र–मध्यप्रदेश–छत्तीसगढ़ (MMC) ज़ोन में सामने आई है। MMC के स्पेशल ज़ोनल कमेटी के प्रवक्ता अनंत उर्फ विकास नागपुरे ने अपने 10 साथियों के साथ किया। यह सरेंडर, नक्सली संगठन की अंदरूनी टूट, अविश्वास और कमांड स्ट्रक्चर के ढहने का खुला संकेत है।
डीआईजी अंकित गोयल ने इसकी आधिकारिक पुष्टि की है।

प्रेस नोट जारी — लेकिन असल वजह अंदरूनी घबराहट और ‘नेतृत्व का खालीपन’

बीते एक सप्ताह में MMC जोन से लगातार दो प्रेस नोट जारी हुए—पहले फरवरी, फिर जनवरी 1 से संघर्ष विराम का एलान। लेकिन ज़मीनी हकीकत ये है कि: नक्सल कमांडर्स के बीच रणनीति को लेकर भारी मतभेद है। बड़े नेताओं की पकड़ कमज़ोर पड़ चुकी है। फोर्स की मैप-आधारित सटीक कार्रवाई ने कई इलाकों में नक्सली मूवमेंट की रीढ़ तोड़ दी है
विकास नागपुरे जैसे SZC स्तर के लीडर का आत्मसमर्पण इस बात का इशारा है कि नक्सल संगठन आदेश तो जारी कर रहा है, लेकिन उसे मानने वाला स्ट्रक्चर अब टूट चुका है।

हॉक फोर्स जवान की शहादत ने पलट दी नक्सल रणनीति।

राजनांदगांव–बालाघाट सीमा पर हुए ऑपरेशन में मप्र हॉक फोर्स के एक जवान की शहादत ने तीनों राज्यों की एजेंसियों को एकजुट कर दिया। इसके बाद: संयुक्त ऑपरेशन की हाई-इंटेंसिटी प्लानिंग, बॉर्डर ज़ोन में ह्यूमन इंटेलिजेंस का विस्तार, MMC जोन की गहरी मॉनिटरिंग, इन सबने नक्सल नेतृत्व पर गहरा दबाव डाला।
यही वजह है कि प्रेस नोट में “संघर्ष विराम” की अपील, वास्तव में बड़े ऑपरेशन से बचने की मजबूरी थी।

MMC का असली भूगोल: सिर्फ 6 ज़िलों की लड़ाई

अक्सर MMC को तीन राज्यों का विशाल ज़ोन माना जाता है, जबकि सच्चाई ये है कि इसका दायरा बेहद सीमित है: मप्र — बालाघाट, मंडला, छग — राजनांदगांव, कवर्धा, खैरागढ़, • महाराष्ट्र — गोंदिया
इन 6 ज़िलों का कंट्रोल तीन बड़े डिवीज़न में बंटा है, जिनका इंचार्ज स्वयं विकास नागपुरे था। विकास का सरेंडर सीधे तौर पर तीनों डिवीज़नों की कमान कमजोर कर देता है।

संगठन में दो बचे कमांडर लेकिन दोनों ‘आईसोलेट’

MMC ज़ोन में अब सिर्फ दो बड़े कमांडर सक्रिय माने जाते हैं रामधेर और सुरेंद्र लेकिन सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक दोनों कमांडरों की टीमों में विभाजन, नए कैडर की कमी, लड़ाकू क्षमता 70% तक घट चुकी है। अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि आने वाले दिनों में ये दोनों भी आत्मसमर्पण के लिए मजबूर हो सकते हैं।

क्यों अलग है यह सरेंडर? — सिर्फ हथियार डालना नहीं, बल्कि संगठन का ‘केंद्रीय ढांचा’ टूटना।

विकास नागपुरे MMC ज़ोन की रणनीति, भर्ती, फाइनेंस और मूवमेंट का मुख्य संचालनकर्ता था।
उसके आत्मसमर्पण का मतलब है:
MMC की वित्तीय सप्लाई लाइन कटी, प्लाटून और कंपनी स्तर पर आदेश देने वाला कोई नहीं बचा, उत्तर और दक्षिण बस्तर से कनेक्टिविटी टूट गई, नए कैडर की भरती लगभग बंद हो गई. सुरक्षा बलों की भाषा में यह “नेटवर्क को सपोर्ट करने वाली रीढ़ टूटना” कहलाता है। नतीजा यह है कि MMC जोन अब ‘डिफेंसिव मोड’ में है। अब नक्सली खुद फोर्स के पास संदेश भेजकर संघर्ष विराम की अपील कर रहे हैं। यह उस संगठन की वास्तविक स्थिति बयान करता है जो कभी महाराष्ट्र–छत्तीसगढ़–मध्यप्रदेश के बेहद संवेदनशील क्षेत्र में विस्तार की कोशिश कर रहा था।

यह सिर्फ सरेंडर नहीं, बल्कि MMC जोन के विघटन की शुरुआत है।

अगर रामधेर और सुरेंद्र भी हथियार डालते हैं, तो आने वाले महीनों में MMC जोन का पूरा ढांचा खत्म हो सकता है। इनके सरेंडर से नक्सल उन्मूलन की दिशा को और मजबूती मिलेगी। इस तरह नक्सल लीडर के आत्मसमर्पण, 31 मार्च 2026 की डेड लाइन के भीतर ही नक्सलवाद खत्म होने की ओर इशारा कर रहा है।