सरकारी तंत्र के शोषण का शिकार बस्तर की शिक्षा एवं रोजगार व्यवस्था- संजय पंत

दंतेवाड़ा। आदिवासी एवं सामाजिक कार्यकर्ता संजय पंत ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बस्तर की शिक्षा एवं रोजगार व्यवस्था पर सवाल उठाए है। विज्ञप्ति में उल्लेख है कि शुरुआत मैं स्वतंत्र भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद जी के प्रसिद्ध कथन से करना चाहता हूं।
“यदि सच्चे दिल से शिक्षा प्रदान की जाए तो समाज में क्रांति लाई जा सकती है।” बस्तर क्षेत्र में निवासरत आदिवासियों के शिक्षा एवं रोजगार पाने के अधिकारों के साथ राज्य सरकार के द्वारा किस प्रकार खिलवाड़ किया जा रहा है इसका जीता-जागता उदाहरण स्वामी आत्मानंद स्कूलों में शिक्षक भर्ती की प्रक्रिया है। शिक्षक भर्ती की इस प्रक्रिया द्वारा यह स्पष्ट होता है कि दिल्ली एवं रायपुर के AC कमरों में बैठे राजनेताओं एवं अधिकारियों ने पांचवीं अनुसूची लगे हुए बस्तर क्षेत्र में आदिवासी समाज को यह सीधी चुनौती दी है। हम तो ऐसे ही तुम्हारा शोषण करते रहेंगे क्योंकि तुम्हारे जनप्रतिनिधि ही सोये हुए हैं।
स्वामी आत्मानंद स्कूलों में शिक्षा भर्ती की प्रक्रिया
उदाहरण के लिए दंतेवाड़ा जिले के अंतर्गत 6 स्वामी आत्मानंद स्कूल हैँ। प्रत्येक स्कूल के संचालन के लिये उस स्कूल की एक समिति होती है। एवं इस समिति के अध्यक्ष दंतेवाड़ा जिले के कलेक्टर तथा सचिव दंतेवाड़ा जिले के जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) होते हैं तथा इस समिति में संबंधित स्कूल के प्रिंसिपल को भी शामिल किया जाता है। राज्य की राजधानी में बैठे शोषणकारी तत्वों ने स्वामी आत्मानंद स्कूल शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में भर्ती का आधार राज्य, संभाग, जिला या ब्लॉक मुख्यालय को ना बनाकर स्कूल को बनाया है। इस भर्ती प्रक्रिया में औसतन प्रति स्कूल एक शिक्षक की भर्ती हुई है। यदि पूरे दंतेवाड़ा जिले को आधार मानकर भर्ती की प्रक्रिया की जाती तो पूरे दंतेवाड़ा जिले के लिए 6 शिक्षकों की भर्ती होती और आरक्षण की प्रक्रिया का पालन होता किंतु सोची समझी गई साजिश के तहत इस भर्ती प्रक्रिया का आधार एक स्कूल को बनाया गया है। क्योंकि उस स्कूल के लिये शिक्षक के 1 पद की भर्ती हुई है एवं 1 पद की भर्ती के लिए आरक्षण की व्यवस्था नहीं की जा सकती है।
साथियों, अब मैं फिर से ऊपर लिखे गए देश के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद के कथन को बस्तर के संदर्भ में याद करना चाहता हूं। राजनैतिक पार्टियां किस दिल से बस्तर के आदिवासियों को शिक्षा देना चाहती है एवं बस्तर के आदिवासियों को बेरोजगार एवं अशिक्षित रखने के पीछे सरकार की मंशा क्या है। सभी राजनीतिक पार्टियों के जनप्रतिनिधियों की इस मामले में चुप्पी आदिवासी समाज के साथ एक छलावे जैसा है। राज्य के सभी ब्लॉकों में इसी प्रक्रिया के तहत संविदा में शिक्षकों की भर्ती की गई है। इसलिए यह समस्या सिर्फ आदिवासी समुदाय से जुड़ी समस्या नहीं है बल्कि अनुसूचित जाति एवं पिछड़े वर्ग के भाइयों को भी व्यापक रूप में प्रभावित करेगी। चूंकि बस्तर क्षेत्र में पांचवी अनुसूची लागू है अतः यहां के सभी स्वामी आत्मानंद स्कूलों के शिक्षक भर्ती में बस्तर के मूल वासियों को प्राथमिकता देना चाहिए। एक तरफ राज्य सरकार कमजोर पेसा कानून देकर आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों का शोषण कर रही है वहीं दूसरी ओर इस तरह की भर्ती प्रक्रियाओं के माध्यम से आदिवासियों के शिक्षा एवं रोजगार के अधिकारों का हनन कर रही है।
अंत में मैं केंद्र सरकार, राज्य सरकार एवं बस्तर क्षेत्र में व्याप्त हिंसा से जुड़े़ सभी पक्षों से एक बार पुन: अपील करना चाहता हूं कि बस्तर क्षेत्र में दशकों से व्याप्त हिंसा की समाप्ति एवं खुशहाल तथा नये बस्तर के निर्माण के लिए जल्दी से जल्दी बातचीत की शुरुआत करें एवं मूलवासियों के अधिकारों की रक्षा करें।