CHHATTISGARHNarayanpur

राजबेड़ा की अद्भुत धरोहर: गणेश–दुर्गा की शताब्दी पुरानी मूर्तियाँ, ग्रामीणों की आस्था और विश्वास का प्रतीक।

 

सुरेश सोनी नारायणपुर/कोंडागांव। घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच बसा छोटा सा गाँव राजबेड़ा। बाहरी दुनिया के लिए यह एक साधारण सा गांव होगा, लेकिन यहाँ की पहचान उस प्राचीन मंदिर से है, जहाँ भगवान गणेश और माँ दुर्गा की ऐसी प्रतिमाएँ विराजमान हैं जो 100 साल से भी अधिक पुरानी मानी जाती हैं। ग्रामीण कहते हैं कि इन मूर्तियों का आकार वर्षों से धीरे-धीरे बढ़ रहा है। यही वजह है कि लोग इन्हें जीवंत और चमत्कारी मानते हैं। मंदिर भले ही सादा हो, लेकिन श्रद्धा और विश्वास की शक्ति से यह जगह आज भी भक्तों का आस्था केंद्र बनी हुई है।

चंदे से बना मंदिर, प्रशासन मौन

सरकारी मदद से अब तक मंदिर को कोई सहारा नहीं मिला। गाँव के लोग अपनी जेब से पैसे इकट्ठा कर वर्षों से इसे संजोए हुए हैं। हफ्ते में हर सोमवार को विशेष पूजा-अर्चना होती है। ग्रामीण मानते हैं कि यहाँ संतान प्राप्ति की मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। कई बार ग्रामीणों ने अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से संरक्षण की गुहार लगाई, ज्ञापन सौंपे, मौखिक विनती की, लेकिन सब बेनतीजा रहा। मंदिर आज भी पहचान और संरक्षण के इंतजार में है।

प्रतिमा से जुड़ी कई रहस्यमयी कथा।

राजबेड़ा की प्रतिमाओं से जुड़ी एक कहानी आज भी लोगों को रोमांचित करती है। बुजुर्ग बताते हैं कि जब यह इलाका बस्तर जिले का हिस्सा हुआ करता था, उस समय एक तहसीलदार ने मूर्ति को कोंडागांव ले जाने की कोशिश की।बैलगाड़ी से मूर्ति को ले जाया जा रहा था, तभी पहिया टूट गया और गाड़ी कीचड़ में धंस गई। उसके बाद गांव में अजीब घटनाएँ घटने लगीं—लोग बीमार पड़ने लगे, और यहां तक कि तहसीलदार का बेटा भी असमय काल के गाल में समा गया। इन घटनाओं ने तहसीलदार को हिला दिया और उन्होंने तत्काल मूर्ति को वापस राजबेड़ा में स्थापित करने का आदेश दिया। तभी से यह प्रतिमा यहीं विराजमान है और निरंतर पूजा-अर्चना हो रही है।

गणेश चतुर्थी पर उमड़ता है सैलाब।

हर साल गणेश चतुर्थी के अवसर पर राजबेड़ा में विशेष रौनक देखने को मिलती है। आसपास के गांवों से श्रद्धालु यहाँ पहुँचते हैं और दिनभर भजन, पूजन और उत्सव का माहौल रहता है। यह मंदिर अब केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति और आस्था की जीवित पहचान बन चुका है।

उपेक्षा के बावजूद अटूट आस्था।

सरकारी उपेक्षा और साधनों की कमी के बावजूद ग्रामीण इस धरोहर की रक्षा कर रहे हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी लोग इसे अपना कर्तव्य मानकर निभाते आ रहे हैं। ग्रामीणों की एक ही मांग है कि इस धरोहर को संरक्षित किया जाए ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस चमत्कारी आस्था स्थल को उसी रूप में देख सकें।