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गोलियों और बारूदी सुरंगों के साए से निकलकर विकास की राह पर बढ़ा नीलावाया।

आजादी के 75 साल बाद बदली नीलावाया की तकदीर

दंतेवाड़ा।  कभी नक्सल हिंसा, बारूदी सुरंगों और चुनाव बहिष्कार के लिए देशभर में चर्चित रहा नीलावाया गांव अब विकास की नई तस्वीर पेश कर रहा है। जिस गांव तक पहुंचना कभी जान जोखिम में डालने जैसा था, वहां अब पक्की सड़क पहुंच चुकी है। सड़क के साथ बिजली, पानी, मोबाइल नेटवर्क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं का भी विस्तार हुआ है। करीब दो दशक के लंबे इंतजार के बाद नीलावाया अब विकास की मुख्यधारा से जुड़ता नजर आ रहा है।

2018 में लोकतंत्र पर हुआ था खूनी हमला।

नीलावाया का नाम वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव के दौरान पूरे देश में सुर्खियों में आया था। गांव में पहली बार मतदान कराने की तैयारी थी, लेकिन मतदान से ठीक पहले नक्सलियों ने हमला कर लोकतंत्र को चुनौती दी। इस हमले में दूरदर्शन के कैमरामैन अच्युतानंद साहू सहित सुरक्षा बल के तीन जवान शहीद हुए थे। घटना के बाद नक्सलियों ने मलगेर नदी पर बनी पुलिया और सड़क को कई जगह क्षतिग्रस्त कर दिया। सुरक्षा और प्रशासन की पहुंच रोकने के लिए सड़क निर्माण में लगातार बाधाएं खड़ी की गईं। नतीजा यह रहा कि विकास की रफ्तार थम गई और नीलावाया लंबे समय तक मुख्यधारा से कटा रहा।

बदला माहौल तो विकास ने पकड़ी रफ्तार।

समय के साथ इलाके का माहौल बदला। नक्सलवाद के खिलाफ सुरक्षा अभियान तेज हुआ और सुरक्षा के साथ विकास को भी प्राथमिकता दी गई। सुरक्षा बलों की बढ़ती मौजूदगी और नक्सल प्रभाव में कमी के बाद वर्षों से अधूरा पड़ा सड़क निर्माण फिर शुरू हुआ। अब जिस रास्ते पर कभी बारूदी सुरंगों का डर बना रहता था, उसी रास्ते पर विकास के पहिए दौड़ रहे हैं। पक्की सड़क ने प्रशासन की पहुंच आसान करने के साथ ग्रामीणों के लिए भी आवागमन का रास्ता खोल दिया है।

सड़क पहुंची तो बदलने लगी ग्रामीणों की जिंदगी।

नीलावाया के लिए सड़क महज आवागमन का साधन नहीं, बल्कि बदलाव की शुरुआत है। अब मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाने में आसानी हो रही है और एंबुलेंस की पहुंच गांव तक बनी है। स्कूलों में शिक्षकों की पहुंच बेहतर हुई है, जिससे बच्चों की पढ़ाई को भी गति मिली है। गांव में पानी की टंकी, बिजली और मोबाइल नेटवर्क जैसी सुविधाओं का विस्तार हुआ है। सड़क बनने के साथ प्रशासनिक योजनाओं और जरूरी सेवाओं की पहुंच भी आसान हुई है।

आसपास के गांवों को भी मिला फायदा।

नीलावाया तक सड़क पहुंचने का असर आसपास के गांवों पर भी पड़ा है। पोटाली, बुरगुम, पुजारीपाल और गोंडेरास जैसे गांवों के लिए संपर्क व्यवस्था बेहतर हुई है। ग्रामीणों के लिए बाजार तक पहुंचना आसान हुआ है। वनोपज और कृषि उत्पादों को बाजार तक ले जाने में सहूलियत मिलने से ग्रामीणों को अपनी मेहनत की उपज का बेहतर मूल्य मिलने की उम्मीद बढ़ी है। इस तरह सड़क सिर्फ गांवों को जोड़ने का माध्यम नहीं बनी, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी गति देने लगी है।

दो दशक बाद पूरा हुआ सड़क का सपना।

नीलावाया के ग्रामीणों को सड़क के लिए करीब दो दशक तक इंतजार करना पड़ा। वर्ष 2004 में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत फूलपाड़ से कोलियानपारा तक सड़क स्वीकृत हुई थी, लेकिन नक्सली हिंसा और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के चलते निर्माण कार्य आगे नहीं बढ़ सका। ठेकेदार को काम छोड़ना पड़ा और अनुबंध भी निरस्त करना पड़ा। वर्ष 2023 में सड़क निर्माण का काम दोबारा शुरू हुआ और दिसंबर 2025 में निर्माण पूरा हुआ। करीब 3 किलोमीटर लंबी इस सड़क से 368 परिवारों के लगभग 1,953 लोगों को सीधा लाभ मिल रहा है।

सड़क बनी बदलाव की पहचान।

कभी नक्सल हिंसा और सड़क के अभाव के कारण देश-दुनिया से कटा नीलावाया अब बदलाव की कहानी लिख रहा है। यहां बनी सड़क सिर्फ डामर की एक पट्टी नहीं, बल्कि वर्षों के इंतजार, संघर्ष और विकास की उम्मीद का प्रतीक बनकर सामने आई है। गोलियों के साए से निकलकर नीलावाया अब विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है। कभी जहां सड़क बनाना चुनौती था, आज वही सड़क गांव के बदलते भविष्य की सबसे बड़ी तस्वीर बन गई है।