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दन्तेवाड़ा में नक्सली बहिष्कार बेअसर, नक्सलगढ़ के मतदाताओं ने उंगलियों में लगवाई लोकतंत्र की स्याह।

दंतेवाड़ा विधानसभा के संवेदनशील क्षेत्रों में पहली बार हुआ मतदान।

 

दन्तेवाड़ा में बम्पर वोटिंग, 2018 की तुलना में 10 फीसदी अधिक मतदान।

धीरेंद्र तिवारी दंतेवाड़ा। दन्तेवाड़ा विधानसभा क्रमांक 88 में इस बार चुनाव में 70.13 प्रतिशत मतदान हुआ है। 2018 में 60.62 प्रतिशत की तुलना में इस बार लगभग 10 फीसदी ज्यादा मतदाताओ ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया है। इसकी बड़ी वजह नक्सलियों की पकड़ कमजोर होना माना जा रहा हैं। चुनाव में अतिसंवेदनशील क्षेत्रों में भी पोलिंग बूथ होने की वजह से वहाँ के मतदाताओ ने बढ़चढ़ के लोक तंत्र के पर्व में हिस्सा लिया। दन्तेवाड़ा में नक्सली बहिष्कार बेअसर रहा। दन्तेवाड़ा जिले के इंद्रावती नदी के पार के गांव चेरपाल, तुमड़ीगुंडा, पाहुरनार, कुआकोंडा क्षेत्र के बुरगुम पोटाली, ककाड़ी, हिरोली, गुमियापाल, कुटरेम, आलनार, कटेकल्याण क्षेत्र के चिकपाल, मारजुम, सुरनार, टेलम टेटम समेत सभी अतिसंवेदनशील गांव के ग्रामीणों ने इस बार लोकतंत्र के महापर्व में अपने मतों की आहुति दी है। नक्सलियों की चेतावनी के बावजूद इन केंद्रों में वोटर निकले और लोकतंत्र की स्याह अपनी उंगलियों में लगवाई। ये एक बड़ा बदलाव दन्तेवाड़ा जिले में दिख रहा है। सुरक्षा बलों की मुस्तेदी और चुनाव से पहले सभी क्षेत्रो में गश्त से नक्सली बैकफुट पर रहे। चुनाव से पहले नक्सली ठिकानों पर सुरक्षाबलो की कार्यवाही से इस बार चुनाव में नक्सली नापाक हरकतो को अंजाम नही दे पाए है। चुनाव के पहले चरण में सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ, कोबरा, एसटीएफ, सीएएफ, आरपीएफ, डीआरजी, बस्तर फाइटर, महिला कमांडो की तैनाती की गई थी जो हर चुनौती से निपटने तैयार थे। बस्तर आईजी पी सुंदर राज एवं एसपी गौरव रॉय की कुशल रणनीति से दन्तेवाड़ा में शान्तिंपूर्ण मतदान हुआ।

 

आयोग की तैयारी एवं बूथ आकर्षण से बढ़ा मतदान प्रतिशत।

जिला प्रशासन के स्वीप कार्यक्रम के तहत व्यापक प्रचार प्रसार से इस बार ज्यादातर लोग मतदान में शामिल हुए। दंतेवाड़ा विधानसभा में 2023 की तुलना में 21350 अधिक मतदाताओ ने मतदान किया है। 2018 में 187407 मतदाताओं में 113599 वोटरों ने वोट किया था जबकि 2023 में 192440 मतदाताओं में 134478 मतदाताओं ने अपने मत का प्रयोग किया है। जिले के कई मतदाताओं के आकर्षण के लिए मतदान केंद्रों को संगवारी केंद्र के रूप में विकसित कर सेल्फी प्वांइट बनाये गए थे। जिसकी वजह से मतदाताओं में काफी उत्साह भी रहा। युवा मतदाता इन केंद्रों में सेल्फी लेते दिखे। दन्तेवाड़ा में चुनावों में लोगो का रुझान बढ़ा है। ग्रामीण क्षेत्रों में लंबी कतारें बुलेट पर बैलेट की जीत को परिदर्शित करता है।

मतदाताओं में दिखा उत्साह, केंद्रों में लम्बी कतार।

दंतेवाड़ा जिले में हुए चुनाव में मतदाताओं में काफी उत्साह देखा गया। सुबह 7:00 बजे से ही मतदाता मतदान केंद्रों के सामने लाइन लगाकर खड़े हो गए। निर्वाचन आयोग द्वारा संवेदनशील क्षेत्रों में सुबह 7:00 से 3:00 तक मतदान की समय सीमा निर्धारित की गई थी बावजूद इसके समय समाप्ति के बाद भी कई केंद्रों में देर रात तक मतदान होता रहा। यही वजह है कि इस बार दंतेवाड़ा विधानसभा क्षेत्र में 10 फ़ीसदी मतदान अधिक हुआ है। यहां मतदाता अपने विधायक को चुनने के लिए काफी उत्साहित नजर आए। प्रदेश में राजनीतिक पार्टियों के द्वारा लाये गए घोषणा पत्र मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित किया है। धान किसान और सम्मान को फोकस करते हुए सभी पार्टियों ने घोषणा पत्र तैयार किया है। इसलिए विधानसभा में बंपर वोटिंग होना लोक लुभावन घोषणा पत्र को भी माना जा रहा है।

 

नक्सलगढ़ में पहली बार हुआ मतदान, लोगो ने बढ़चढ़ कर लिया हिस्सा।
दंतेवाड़ा के बेहद ही संवेदनशील क्षेत्रों में इस बार छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद पहली बार मतदान हुआ है। मतदान के दौरान लोगों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया है। इससे पहले होने वाले विधानसभा चुनावो में यहां के मतदान केंद्रों को दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया जाता था। दूरी और नक्सल बहिष्कार के चलते मतदाता इन केंद्रों में नहीं पहुंच पाते थे। लेकिन इस बार चुनाव में निर्वाचन आयोग द्वारा अतिसंवेदनशील 7 केंद्रों को अन्य जगह शिफ्ट किया गया था। जबकि 14 मतदान केंद्रों को उनके ही गांव में मतदान करने का फैसला लिया था जिसकी वजह से इन गांव मे लोग सालो बाद यहां पर मतदान किया। दंतेवाड़ा के धुर नक्सल प्रभावित क्षेत्र बुरगुम में 1993 के बाद विधानसभा चुनाव में ग्रामीणों ने अपनी सहभागिता दी है यहां 185 मतदाताओं में वोट डाला है। जबकि कई मतदाता पहचान पत्र नहीं होने की वजह से मतदान नहीं कर पाए हैं। इसके अलावा कुआकोंडा ब्लाक , इंद्रावती नदी के पार के गांव और कटेकल्याण ब्लॉक के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भी सालों बाद पहली बार मतदाताओं ने अपने मतों का प्रयोग किया है और यहां पर मतदाताओं ने बेखौफ होकर नक्सली बहिष्कार को दरकिनार करते हुए अपनी उंगलियों पर लोकतंत्र की स्याह लगवाई है।