धर्मांतरण-नक्सलवाद पर भारी पड़ रही भक्ति, बस्तर की आस्था का प्रतीक: माई दंतेश्वरी धाम में नवरात्रि पर उमड़ा जनसैलाब।

घुटने के बल, सैकड़ों किलोमीटर पदयात्रा कर पहुंच रहे श्रद्धालु।
दंतेवाड़ा। शारदीय नवरात्रि के पावन अवसर पर बस्तर की आराध्य देवी माई दंतेश्वरी के धाम दंतेवाड़ा में श्रद्धा और आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिला। नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा देवी के स्वरूप में माई दंतेश्वरी ने भक्तों को दर्शन दिए। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि पड़ोसी राज्यों—तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र और ओडिशा से भी हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचे।
धर्मांतरण और नक्सलवाद जैसी चुनौतियों से घिरे बस्तर में यह नज़ारा अलग ही तस्वीर प्रस्तुत करता है। भक्तों का उमड़ा जनसैलाब यह साबित करता है कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद माई दंतेश्वरी में लोगों की आस्था अटूट है।
आस्था और परंपरा का विराट संगम..
हर वर्ष की तरह इस बार भी नवरात्र पर दंतेवाड़ा धाम में श्रद्धालुओं की संख्या में इज़ाफ़ा देखा गया। खासकर चौथे और पाँचवें दिन भक्तों की भीड़ अत्यधिक रहती है। आज हज़ारों श्रद्धालु यहाँ पहुंचे, जिनमें से कई भक्त घुटनों के बल चलकर माता के दरबार तक आए। धाम में भक्तों की भक्ति और भावनाओं के कई रूप दिखाई देते हैं—कहीं लोग ध्यानमग्न होकर देवी से संवाद करते दिखे तो कहीं महिलाओं पर देवी का आवेश भी देखा गया, जिसे श्रद्धालु माता का प्रत्यक्ष आशीर्वाद मानते हैं।

पड़ोसी राज्यों से पहुंच रहे हैं भक्त..
छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों के अलावा पड़ोसी राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आ रहे हैं। यद्यपि रोजाना आने वाले बाहरी भक्तों का सटीक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन अनुमान के मुताबिक अब तक हजारों की संख्या में श्रद्धालु पड़ोसी राज्यों से दंतेवाड़ा पहुंच चुके हैं। वहीं छत्तीसगढ़ से तो प्रतिदिन हजारों लोग माता के दर्शन के लिए आ रहे हैं।
माई दंतेश्वरी मंदिर का इतिहास और महत्व…
दंतेवाड़ा स्थित माई दंतेश्वरी मंदिर सदियों पुराना है और बस्तर संभाग की आस्था का मुख्य केंद्र है। यह मंदिर बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी को समर्पित है। इतिहास के अनुसार, यह मंदिर उस स्थल पर स्थित है जहाँ देवी सती का दांत गिरा था, इसी कारण इसका नाम दंतेश्वरी पड़ा। माना जाता है कि यह धाम शक्ति पीठों में से एक है और यहीं से बस्तर अंचल की धार्मिक परंपराएँ संचालित होती रही हैं।
बस्तर दशहरा और मां दंतेश्वरी..
माई दंतेश्वरी का महत्व केवल आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे बस्तर की संस्कृति और परंपरा से गहराई से जुड़ा हुआ है। बस्तर का दशहरा उत्सव देश में अनोखा है, क्योंकि यहाँ दशहरा राम-रावण युद्ध की स्मृति में नहीं बल्कि मां दंतेश्वरी की आराधना के लिए मनाया जाता है। इस अवसर पर बस्तर रियासत के राजा आज भी परंपरा के अनुसार दंतेश्वरी मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं और पूरे संभाग में यह पर्व 75 दिनों तक चलता है। यह परंपरा सीधे-सीधे माता दंतेश्वरी की शक्ति और आशीर्वाद से जुड़ी हुई मानी जाती है।
भक्ति और विश्वास का प्रतीक
आज जब बस्तर धर्मांतरण और नक्सलवाद जैसी समस्याओं से जूझ रहा है, ऐसे समय में दंतेवाड़ा धाम में उमड़ा आस्था का सैलाब यह संदेश देता है कि जनमानस की आस्था और विश्वास हर संकट पर भारी है। नवरात्र के इस पावन पर्व पर दंतेवाड़ा का यह धाम सिर्फ आस्था ही नहीं बल्कि संस्कृति और परंपरा का विराट संगम बनकर पूरे अंचल को ऊर्जा और प्रेरणा प्रदान करता है।

