Hareli 2026: छत्तीसगढ़ में क्या है हरेली का महत्व, खेती-किसानी से लेकर प्रकृति और लोकसंस्कृति तक जुड़ी है इसकी पहचान

रायपुर। हरेली तिहार छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति और कृषि परंपरा का बेहद महत्वपूर्ण पर्व है। इसे प्रदेश का प्रमुख पारंपरिक लोकपर्व माना जाता है। सावन के मौसम में जब चारों ओर हरियाली छा जाती है और खेतों में फसलें लहलहाने लगती हैं, तब हरेली का उत्सव ग्रामीण जीवन में नई उमंग लेकर आता है। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा नहीं है, बल्कि किसान, खेती, पशुधन, प्रकृति और गांव की सामुदायिक संस्कृति को भी अपने साथ जोड़ता है। हरेल से त्योहा की शुरूआत होती है और इसे छत्तीसगढ़ का पहला त्योहार भी कहा जाता है, जिसे बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। इस साल यह पर्व 12 अगस्त को मनाया जाएगा।
खेती-किसानी से जुड़ा है हरेली का रिश्ता
हरेली का सबसे बड़ा महत्व खेती-किसानी से जुड़ा हुआ है। इस अवसर पर किसान अपने कृषि उपकरणों की साफ-सफाई कर उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। नागर, गैंती, कुदाली, फावड़ा और खेती में इस्तेमाल होने वाले दूसरे औजारों को सम्मानपूर्वक पूजा जाता है। दरअसल, किसान के लिए कृषि उपकरण केवल काम करने का साधन नहीं होते, बल्कि उसकी मेहनत और आजीविका का आधार होते हैं। इसलिए हरेली के दिन इन उपकरणों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।
हरियाली और प्रकृति का संदेश
‘हरेली’ शब्द का संबंध हरियाली से माना जाता है। सावन में बारिश के बाद खेत-खलिहान और गांव का प्राकृतिक परिवेश हरा-भरा हो जाता है। ऐसे समय में मनाया जाने वाला यह पर्व इंसान और प्रकृति के बीच गहरे संबंध को दर्शाता है। आज के समय में हरेली का संदेश पर्यावरण संरक्षण से भी जोड़ा जा सकता है। पेड़-पौधों, जल और मिट्टी के संरक्षण की भावना इस लोकपर्व को और अधिक प्रासंगिक बनाती है। छत्तीसगढ़ शासन ने भी हरेली को प्रकृति प्रेम और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी से जोड़कर पौधारोपण का संदेश दिया है।
गेड़ी और पारंपरिक खेल बनाते हैं पर्व को खास
हरेली की पहचान केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। गांवों में इस दिन गेड़ी चढ़ने की परंपरा खास आकर्षण का केंद्र रहती है। बच्चे और युवा गेड़ी पर चढ़कर अपनी कला और संतुलन का प्रदर्शन करते हैं। इसके अलावा कई स्थानों पर पारंपरिक खेल और ग्रामीण प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं। इन आयोजनों के जरिए नई पीढ़ी को छत्तीसगढ़ की पारंपरिक जीवनशैली और लोक संस्कृति से जोड़ने का अवसर मिलता है।
पशुधन के प्रति सम्मान का पर्व
छत्तीसगढ़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में खेती के साथ पशुधन की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसलिए हरेली के दौरान पशुओं की देखभाल और उनसे जुड़ी परंपराओं को भी विशेष स्थान मिलता है। किसान अपने पशुधन के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। यह परंपरा बताती है कि छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति में इंसान, पशु, खेत और प्रकृति को एक-दूसरे से अलग नहीं माना जाता था।
लोकव्यंजन और उत्सव का माहौल
हरेली के दिन घरों में पारंपरिक छत्तीसगढ़ी पकवान बनाए जाते हैं। परिवार और गांव के लोग मिलकर त्योहार की खुशियां मनाते हैं। लोकगीत, पारंपरिक आयोजन और आपसी मेल-मिलाप इस पर्व की रौनक बढ़ाते हैं। यही वजह है कि हरेली केवल किसानों का त्योहार नहीं रह गया है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की सामूहिक सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुका है। छत्तीसगढ़ लोकपर्व के साथ लोक व्यंजनों के लिए भी जाना जाता है, छत्तीसगढ़ में हरेली के लिए भी कुछ खास व्यंजन हर घर में पकाए जाते हैं, जैसे- गुड़ के चीले, ठेठरी, खुरमी और गुलगुला भजिया।
नई पीढ़ी के लिए हरेली का संदेश
आधुनिक दौर में जब खेती और ग्रामीण जीवन में तेजी से बदलाव आ रहा है, तब हरेली जैसे लोकपर्व हमारी जड़ों से जुड़ने का अवसर देते हैं। यह पर्व याद दिलाता है कि हमारी समृद्धि का आधार मिट्टी, पानी, खेती और प्रकृति से जुड़ा है। हरेली इसलिए सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की मिट्टी, किसान की मेहनत, हरियाली और लोकसंस्कृति का उत्सव है। यही इसकी सबसे बड़ी पहचान और खासियत है।